रविवार, 28 फ़रवरी 2016

लंबरदार हो गए हैं -

कुर्बान हो गए राष्ट्रवाद पर अमर सपूत ,
गद्दार हो गए हैं -
जख्म जिंदा हैं सितम के तन पर दाग बनकर, 
दागदार बन गए हैं 
जिनको जाति - धर्म फिरके ,ही प्यारे थे
खुद्दार बन गए हैं-
जो वफादार थे फिरंगियों के, देश गौड़ था
वफादार हो गए हैं -
जिनकी उठी कलम दुश्मनों की शान में,
कलमदार हो गए हैं-
जिसने देश को मंदिर नहीं, पायदान समझा 
लंबरदार हो गए हैं -
वतन तो वतन, द्रोह है इंसानियत से जिन्हें ,
वतन के ठेकेदार हो गए हैं -

उदय वीर सिंह 



2 टिप्‍पणियां:

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " जय जय संतुलन " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

yashoda Agrawal ने कहा…

प्रस्तुति भाई कुलदीप जी की और सूचना मेरे द्वारा आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" मंगलवार 01 मार्च 2016 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!