गुरुवार, 12 जनवरी 2012

दिल्ली से दिल्लगी

              दिल्ली   की  गलियों से 
              दिल्लगी     हमारी     है -
              पर्दा      बे       पर्दा     है,
              हसरत        उधारी     है -
गुलशन  ख्यालों  का ,ख्वाबों की मंजरी 
उन्मुक्त   हाथों  में  आशाओं  की   बंसरी -


             बिखरी   लटों को  अपने
             प्यार    से      संवारी   है- 
मधु  का जखीरा है ,जगमगाता  हीरा  है ,
पागल बनाये जो सियासत की मदिरा है -


            जलती   मशाल   जान,
            पतिंगों    ने   वारी    है-
रोये  हैं  ज़ख्मो - गम , दिल्ली न रोई  है ,
रोशन चिरागां दे ,एक पल भी न सोयी है -


            नफ़रत और प्यार  का ,
            मुकम्मल   लिखारी  है- 
बसने ,उजड़ने का , दर्द -ए- फ़साना  है ,
दरिया ए- दिल  का ,दीवाना  जमाना है -


             मल्लिका -  ए - रोशनी ,
              दुनिया      उजारी     है-
आश्रय , यतीमों   का ,जहीनों  का   पालना ,
संस्कृतियों का संगम एक भारत का आईना-


              युगों तक सलामत दिल्ली ,
              शुभ  कामना     हमारी   है -


                                                          उदय वीर सिंह .  



8 टिप्‍पणियां:

S.N SHUKLA ने कहा…

बहुत सुन्दर, बधाई.

कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधार कर अपना स्नेहाशीष प्रदान करें, आभारी होऊंगा.

नीरज गोस्वामी ने कहा…

बेहतरीन रचना...बधाई...

नीरज

Sunil Kumar ने कहा…

दिल्ली से दिल्लगी अच्छी लगी वैसे दिल्ली दिल वालों हैं सियासत को छोड़ कर :):)

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बहुत खूब,
दिल्ली सदा ही हमारी रहेगी।

Rakesh Kumar ने कहा…

मल्लिका - ए - रोशनी ,
दुनिया उजारी है-
आश्रय,यतीमों का ,जहीनों का पालना ,
संस्कृतियों का संगम एक भारत का आईना-


आपकी 'दिल्ली से दिल्लगी'
दिलखुश कर गई उदय जी.

हर शब्द लाजबाब,हर भाव बेमिशाल.

बहुत बहुत आभार जी.

रविकर ने कहा…

खूब-सूरत प्रस्तुति |
बहुत-बहुत बधाई ||

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

वाह!
बहुत बढ़िया!
लोहड़ी पर्व के साथ-साथ उत्तरायणी की भी बधाई और शुभकामनाएँ!

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति