सोमवार, 16 जनवरी 2012

सौम्यता

फूलों  की  वीथियों  में ,शूलों  को  पाए हैं ,         
जख्म  इतने  गहरे हैं ,भूले  न  भुलाये हैं -      


टूटे   थे  पत्ते  कितने  तरुअर  की  साखों  से ,
आँधियों   के  काफिलों  ने  कैसे  विखराए हैं -


मुसव्वीर  थे   ख्वाबों   के    कितने  उकेरे हैं  ,
घोलने   को    रंगों    को,  आंसू    मिलाये  हैं   


तासों   के   पत्तों  से   महल  क्यों  बनाया  था  ,
हाथ  कितने   ख़ाली  हैं, आशामां के  साये  हैं  -


कहने को तो दुनिया सारी अपनी सी लगती है  ,
अपनों  की  दुनियां  में हम , कितने  पराये  हैं -


                                                   उदय वीर सिंह  

7 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

दुनिया को जब अपना समझा, तब ही हुयी परायी रे,

Rakesh Kumar ने कहा…

कहने को तो दुनिया सारी अपनी सी लगती है ,
अपनों की दुनियां में हम , कितने पराये हैं -
आपके दिल की टीस दिल को छू रही है.
"सदके जावां" शीर्षक बहुत कुछ कह रहा है.
गम में भी खुद को भुला तसल्ली
देता हुआ.

अनुपम प्रस्तुति के लिए आभार,उदय जी.

रचना दीक्षित ने कहा…

कहने को तो दुनिया सारी अपनी सी लगती है ,
अपनों की दुनियां में हम , कितने पराये हैं

इंसान अकेले आया है और अकेले ही जाना है. सुंदर भाव के साथ बढ़िया प्रस्तुति.

Patali-The-Village ने कहा…

सशक्त और प्रभावशाली रचना|

रेखा ने कहा…

वाह ...बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

अपनी सुविधा से लिए, चर्चा के दो वार।
चर्चा मंच सजाउँगा, मंगल और बुधवार।।
घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

वियोग शृंगार का भी अपना ही रस है।