शुक्रवार, 29 मार्च 2013

नव- वंद




उठता है ज्वाल जलधि में भी  जब
संयम   की   कोख   जल  जाती  है  -
हृदय    गरल    भी    पी   लेता   है     
जब    पीर     सही    न   जाती   है  -

कांच     खनकता ,   हृदय     नहीं  
जब   ठेस   कभी   लग   जाती  है  -
मंगल    मन   का   क्षितिज   जले  
वह   बात    नहीं    की    जाती  है  -

नयन     की   सरिता   बंध    नहीं  
अबिरल       धार    बह   जाती  है  - 
मौन       हृदय       का     आवेदन  
वाचाल    पलक     कह   जाती  है  -

रो    उठता     हिय    अंक    बावरे 
अग्नि     तुषार    बन    जाती   है-

                                -उदय वीर सिंह  

4 टिप्‍पणियां:

vandana gupta ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार (30-3-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
सूचनार्थ!

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

बहुत सुंदर भावों की अभिव्यक्ति,,,,
RECENT POST: होली की हुडदंग ( भाग -२ )

Pratibha Verma ने कहा…

बहुत सुन्दर....होली की हार्दिक शुभकामनाएं ।।
पधारें कैसे खेलूं तुम बिन होली पिया...

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति..