सोमवार, 12 जून 2017

सत्ता के गलियारे कैसे

सत्ता के गलियारे कैसे
जीवन पलड़े पर तोल रहे
संवेदनहीन सरकारें हैं
बोल घृणा के बोल रहे -
कक्ष कोष क्षेत्र रंगों में
मानव विभक्त किया जाता
सुनी राहें न्याय सत्य की
जन दंभ द्वेष में झुलस रहे -
हैं सबके रक्षक सबके पालक
हुए तेरे किसान मेरे जवान
एक राष्ट्र की शीतल बयार में
सत्ता मद विष- घोल रहे -
जीवन सत्ता का खेल नहीं
सृष्टि का अनमोल रतन है
कंचे -कौड़ी के खेल समझ
हार -जीत सम खेल रहे -
सत्ता आज किसी की है
कल और किसी की होगी
जीवन ईश्वर की सत्ता है
जीवन को जीवन रहने दो -

उदय वीर सिंह

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