सोमवार, 12 जून 2017

सत्ता के गलियारे कैसे

सत्ता के गलियारे कैसे
जीवन पलड़े पर तोल रहे
संवेदनहीन सरकारें हैं
बोल घृणा के बोल रहे -
कक्ष कोष क्षेत्र रंगों में
मानव विभक्त किया जाता
सुनी राहें न्याय सत्य की
जन दंभ द्वेष में झुलस रहे -
हैं सबके रक्षक सबके पालक
हुए तेरे किसान मेरे जवान
एक राष्ट्र की शीतल बयार में
सत्ता मद विष- घोल रहे -
जीवन सत्ता का खेल नहीं
सृष्टि का अनमोल रतन है
कंचे -कौड़ी के खेल समझ
हार -जीत सम खेल रहे -
सत्ता आज किसी की है
कल और किसी की होगी
जीवन ईश्वर की सत्ता है
जीवन को जीवन रहने दो -

उदय वीर सिंह

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (13-06-2017) को
रविकर यदि छोटा दिखे, नहीं दूर से घूर; चर्चामंच 2644
पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक