शुक्रवार, 29 सितंबर 2017

आत्मा व वैद्य टूर गए बीमार रह गया

कितना वसूलते कर सुखी रगों से
आत्मा वैद्य टूर गए बीमार रह गया
खरीददार  रहे बाजार रह गया

चुकाने वाले  रहे उधार रह गया -
नामलेवा रहा घर परिवार में कोई
पर वसूली का पूरा अधिकार रह गया -
बंद हो गईं मिलें खाली मिल का मैदान
वो दिवालिया हो गईं समाचार रह गया
सिमट गए हाथ बिखर गए सपने
मालिक आबाद मुलाजिम बर्बाद रह गया

उदय वीर सिंह

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (30-09-2017) को "विजयादशमी पर्व" (चर्चा अंक 2743) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Praveen Pandey ने कहा…

प्रभावी रचना..