मंगलवार, 13 मार्च 2012

लिहाफ

      
हम तो कहते रहे अपनी फरियाद को 
अर्ज था जिनसे वो मुंह छिपाते रहे- 


कर्ज ,था मर्ज था ,मुफलिसी में जिया ,
मौत  को  हादसा  ,वो बताते रहे -


लिख दिया दर्द की दासतां जब कभी ,
देश  द्रोही  की  गाथा  बताते रहे -


हाथ में थी कलम ,रख दी पिस्तौल को 
देश प्रेमी को , को द्रोही बताते रहे -


माना दुनियां ने ,जिसको खुदा की तरह ,
खून , गुर्दा , जिगर  बेच  खाते रहे -


शोध  इंसानियत  पर  तो  होते  रहे ,
इन्सान    से    मुंह   छिपाते  रहे -


                                        उदय वीर सिंह 


   

8 टिप्‍पणियां:

रविकर ने कहा…

क्या बात है भाई |
एक और जबरदस्त प्रस्तुति |
बधाई उदयवीर जी ||

dheerendra ने कहा…

हाथ में थी कलम ,रख दी पिस्तौल को
देश प्रेमी को , को द्रोही बताते रहे -

वाह!!!!!बहुत खूब उदय जी,..बधाई

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

हाथ में थी कलम ,रख दी पिस्तौल को
देश प्रेमी को , को द्रोही बताते रहे -

बहुत खूब ...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति!

Naveen Mani Tripathi ने कहा…

कर्ज ,था मर्ज था ,मुफलिसी में जिया ,
मौत को हादसा ,वो बताते रहे -


लिख दिया दर्द की दासतां जब कभी ,
देश द्रोही की गाथा बताते रहे -

bahut hi gajab ki gajal ....bahut bahut badhai .

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

शोध इंसानियत पर तो होते रहे ,
इन्सान से मुंह छिपाते रहे -

गजब..

dheerendra ने कहा…

बहुत जबरदस्त प्रस्तुति,भावपूर्ण सुंदर रचना,...

RESENT POST...काव्यान्जलि ...: तब मधुशाला हम जाते है,...

lokendra singh rajput ने कहा…

हाथ में थी कलम ,रख दी पिस्तौल को
देश प्रेमी को , को द्रोही बताते रहे..........
बहुत बढ़िया....