गुरुवार, 23 अगस्त 2012

लकीरें हाथों की

कभी लिखा तफ़सील से,कभी मिटा गयी ,
हाथों  की  लकीरें, इतना पता  बता गयीं -

लिखना  तुम्हें   पड़ेगा ,  मुकद्दर  अपना,
कागज,कलम, दवात हाथों में थमा गयी -

बसतीं हैं हौसलों से मुकद्दर  की बस्तियां ,
हाथों   में  जो  नहीं  थी ,हाथों में आ गयीं -
















नैपोलियन ,   के   हाथ में   पाई  न गयीं 
कर्म   की  गलियों  का,  रास्ता बता गयी-

पौरुष के हाथ में है, किस्मत की  पालकी,
हिम्मत नहीं जो खोयी, पहलू में आ गयी -

हाथों की लकीरें पढ़ते ,बीती  है   जिंदगी ,
कभी  अर्श   पर  थी ,फर्श  पर  आ  गयी-

किस्मत  खैरात में  मिलती  नहीं  उदय
बैठा भरोसे भाग्य तो दासता  दिला गयी-

                                                उदय वीर सिंह







6 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

हाथ की लकीरें बनाने वालों की पूजा करती है दुनिया।

Dr.J.P.Tiwari ने कहा…

लिखना तुम्हें पड़ेगा , मुकद्दर अपना,
कागज,कलम, दवात हाथों में थमा गयी -

लाजवाब, बहुत ही सुन्दर और प्रेरक भाव. आभार सर जी, बहुत-बहुत आभार.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

हाथ की लकीरें बहुत कुछ बता देती हैं ...सुंदर अभिव्यक्ति

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

वाह क्या कहने..
बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

वाह क्या कहने..
बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

सुशील ने कहा…

बहुत खूब !