रविवार, 16 फ़रवरी 2014

अवसादियों का तमाशाई दिन ----

विकृतियों को  प्यार कहते हो 
नंगे  को  समझदार  कहते हो -
आत्म-विस्वास से बहुत दूर कम्पित
अवसादी दिन  को त्यौहार  कहते  हो -


हृदय की क्यारियों में प्यार पल्लवित न हुआ
दो पल के जुनूनी हनक को संस्कार कहते हो -

टूट जाता है पछुआ पवन के हलके झोंकों से
सरकंडे को सागर में किश्ती की पतवार कहते हो- 

संत कबीर ने कहा कभी प्रेम हाट में बिकता नहीं
अपने पर कम दूसरों पर ज्यादा एतबार करते हो- 

प्यार अंतहीन सीमाविहीन शर्तहीन प्राण -वायु है 
जो बहता है रगों में उसे तारीख में शुमार करते हो- 

फूल और कसमों से मक्कारी की बू ही आती है 
हम उसे सौदाई कहते हैं तुम वफादार कहते हो -

- उदय वीर सिंह




4 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (17-02-2014) को "पथिक गलत न था " (चर्चा मंच 1526) पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सशक्त अभिव्यक्ति..

Satish Saxena ने कहा…

@फूल और कसमों से मक्कारी की बू ही आती है

वाह भाई जी , बधाई !!

Neetu Singhal ने कहा…

तमाम रबतों-राब्ता मालो-टाल पे टीके हैं..,
तेरी जमीं जरो-जागीर है तुझे रिश्तेदार कहते हैं.....