बुधवार, 3 जून 2015

परजीवी ....


जड़  हूँ
चेतनाविहीन नहीं
समझता हूँ वेदना व 
संवेदना को.....
अवसरवादी नहीं हूँ....
मेरा जीवन लेन-देन पर नहीं
निर्वैर निश्चल
प्रेम पर सृजित,
आश्रय देता है खग को, मृग को
पथिक को भी ....
चिड़िमार बसंत में आता है
साधता है अपना लक्ष्य
भरकर ले जाता है लोथ,
पतझड़ में
दिखाई नहीं देता...
मेरा प्रत्येक अवयव 
अहर्निश सेवा में है 
इस लिए की 
मैं जड़ हूँ .....
तुम हो बुद्धिमान 
परजीवी ....
स्वार्थ जब तक 
साथ 
तब तक ......

उदय वीर सिंह 






5 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सरल जीवन सिद्धान्त, परोपकाराय।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बृहस्पतिवार (04-06-2015) को "हम भारतीयों का डी एन ए - दिल का अजीब रिश्ता" (चर्चा अंक-1996) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

मन के - मनके ने कहा…

सही कहा--अहम-विहीन होना भी पर-चिंतक होना ही है.

बेनामी ने कहा…

अहम-विहीनता संभव नहीं है--यदि हो तो पर-चिंतक हो जाती है,ऐसा हो जाय?

बेनामी ने कहा…

अहम-विहीनता संभव नहीं है--यदि हो तो पर-चिंतक हो जाती है,ऐसा हो जाय?