शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

हो अपयशों की शून्यता -



हो अपयशों की शून्यता
धिक्कार चाहती कलम -
कदाचार को शमशान दो
सदाचार मांगती कलम-
अस्मिता तर्क से कसो नहीं
सम्मान चाहती कलम -
हठ-प्रलाप को विराम दो
ईमान चाहती कलम -
मैं-तुम की प्रवंचना फली नहीं
तत्वाधार चाहती कलम -
समर्पित हो देश आन पर
आधार चाहती कलम-
सिवा कागज भरोषा कहाँ करे
पतवार चाहती कलम -
उदय वीर सिंह

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा आज शनिवार (04-07-2015) को "सङ्गीतसाहित्यकलाविहीना : साक्षात्पशुः पुच्छविषाणहीना : " (चर्चा अंक- 2026) " (चर्चा अंक- 2026) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

Onkar ने कहा…

सुन्दर रचना