शनिवार, 11 जुलाई 2015

काफिला लेकर ....

करूंगा क्या मैं बहारों का काफिला लेकर 
जी न पाऊँगा कहीं गमों को फासला देकर -

मशविरा मसर्रत में हमने पाये हैं बहुत 
हाथ छोड़ा है मेरी गुरबती का वास्ता देकर -

तुमसे शिकायत है शिगाफों से झाँकने वाले 
अनजान बन गए हो , हमें रास्ता देकर -

टूट जाते हैं पत्थर , चोट दिल पे जो लगी 
मुकर जाता है जमाना, फलसफा देकर -

उदय वीर सिंह 

2 टिप्‍पणियां:

Tushar Rastogi ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को शनिवार, ११ जुलाई, २०१५ की बुलेटिन - "पहला प्यार - ज़िन्दगी में कितना ख़ास" में स्थान दिया गया है। कृपया बुलेटिन पर पधार कर अपनी टिप्पणी प्रदान करें। सादर....आभार और धन्यवाद। जय हो - मंगलमय हो - हर हर महादेव।

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

वाह!