मंगलवार, 22 सितंबर 2015

माई के गाँव में

माई के गाँव में पीपल की छांव में 
गोरी के पाँव में ,झांझर के बोल अब 
सुनाई न देते हैं -

मक्के दियाँ रोटियाँ ,मख्खन चे मलाइयाँ,
लस्सी भरी कोलियाँ ,सरसों के साग अब 
दिखाई न देते हैं -

गीतों में बोलियाँ ,हथ गन्ने की पोरियाँ
गिद्दे की टोलियाँ बापू के गाँव अब 
दिखाई  न देते हैं -

गुत से परान्दे,सिर पल्लू  का बिछोड़ा है 
शब्द सुहेले भावें, नितनेम आँगन में 
सुनाई न देते हैं -

सताई गई है प्रीत ,रुलाई गई है प्रीत 
मिटाई गई है प्रीत, कोख आई बेटी को 
बधाई  न देते हैं -

उदय वीर सिंह 





1 टिप्पणी:

Madan Mohan Saxena ने कहा…

भावपूर्ण प्रस्तुति.बहुत शानदार
कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.