रविवार, 11 अक्तूबर 2015

सोचा कैसे ....

सोचा कैसे -
सियासत में ही लाएँगे युवराज को
सीमा का प्रहरी, सोचा कैसे ?
सिर बोझ बहुत है टोपी का अपने
ढोयेँ व्यथा देश की ,सोचा कैसे ?
शिक्षण प्रशिक्षण राजनीति का देंगे
संस्कृति संस्कारों का, सोचा कैसे ?
उदय वीर सिंह का बेटा शहीदी पाये
मरे हमारा बेटा ! सोचा कैसे ?
सम्मेलन दंगा हप्ता वसूली कायम हैं ,
खेतों मेँ हल चलाये सोचा कैसे ?
धूप नैवेद्य दीपों से देवी की पूजा
बेटी कोख में आए ! सोचा कैसे ?
वोट, मंचों की भाषा हिन्दी है
घर में भी बोलेंगे,सोचा कैसे ?
नारों में ही आदर्श अच्छे लगते हैं
जीवन में भी लाएँगे,सोचा कैसे ?
ड्राईंगरूम सजे कैलेंडर किंगफिशर के
भगत बोस आजाद, सोचा कैसे ?

उदय वीर सिंह



5 टिप्‍पणियां:

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 12 अक्टूबर 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (12-10-2015) को "प्रातः भ्रमण और फेसबुक स्टेटस" (चर्चा अंक-2127) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (12-10-2015) को "प्रातः भ्रमण और फेसबुक स्टेटस" (चर्चा अंक-2127) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, बाप बड़ा न भैया, सब से बड़ा रुपैया - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

रचना दीक्षित ने कहा…

नारों में ही आदर्श अच्छे लगते हैं
जीवन में भी लाएँगे,सोचा कैसे ?
ड्राईंगरूम सजे कैलेंडर किंगफिशर के
भगत बोस आजाद, सोचा कैसे ?

जबरदस्त विचार. वही बात है मुख में राम बगल में छुरी. कथनी कुछ करनी कुछ और.