शनिवार, 24 अक्तूबर 2015

किसी की वंदगी को देख


















 



है मौत की अमानत 
हँसती जिंदगी को देख -
ढूँढता है दूसरों में पहले
अपनी गंदगी को देख -
कुफ़्र की चिंता तुम्हें है
किसी की सादगी को देख -
तुम खड़े हो शमशीर लेकर
किसी की वंदगी को देख -


उदय वीर सिंह


4 टिप्‍पणियां:

राजेंद्र कुमार ने कहा…

बहुत ही सुन्दर और बेहतरीन प्रस्तुति, आभार आपका।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (25-10-2015) को "तलाश शून्य की" (चर्चा अंक-2140) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Kailash Sharma ने कहा…

तुम खड़े हो शमशीर लेकर

किसी की वंदगी को देख -

...वाह...बहुत ख़ूबसूरत प्रस्तुति...

Onkar ने कहा…

उम्दा रचना