गुरुवार, 22 अक्तूबर 2015

बुत की प्राण प्रतिष्ठा है ....

बुत की प्राण प्रतिष्ठा है
सड़कों पर जीवन रोता है -
अर्पित करते अर्थ द्रव्य
कहीं जीवन भूखा सोता है -
रोज बदलते परिधान स्वर्ण
कहीं जीवन नंगा होता है -
बहती धार पय घृत अमृत की
जीवन आँसू पीता है -
भाग्य जन्म का दोष समझ
जीवन अभिशापित जीता है -
पत्थर में जीवन की आशा
कहीं जीवन पत्थर होता है -


उदय वीर सिंह


1 टिप्पणी:

राजेंद्र कुमार ने कहा…

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (23.10.2015) को "शुभ संकल्प"(चर्चा अंक-2138) पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।
विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ, सादर...!