रविवार, 14 मई 2017

माँ शब्द नहीं संबल है .....कोटिशः प्रणाम !

माँ शब्द नहीं संबल है .....कोटिशः प्रणाम !
देकर आँचल ओट गगन को रोक लेती है 
नद क्या विपदा के सागर को सोख लेती है 
ग्रन्थों के पन्ने अधूरे कलम बेजान लगती है 
माँ का मुकाम ऊंचा है जन्नत तोड़ लेती है -
वीर खौफजदा रहते हैं तूफानॉ के काफिले
माँ ऐसी दीवार है की रास्ता मोड देती
उदय वीर सिंह

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