बुधवार, 2 नवंबर 2011

फलसफ़ा

माना की गम तमाम हैं खुशियों की कमी नहीं ,
ढूंढो   जो ले चिराग , चिरागों  की   कमी  नहीं -

मंजर -ए- आफ़ताब    डूबा  तो    क्या   हुआ ,
अपनी सी लगती रात ,सितारों की कमी नहीं -

टुटा जो  एक ख्वाब ,ख्वाबों   से  क्या  गिला ,
हसरत तमाम दिल में , ख्वाबों की कमी नहीं-

अश्कों ने घर बना लिया ,पलकों  की छाँव में ,
आया कभी न प्यार,जिन आँखों में नमीं  नहीं-

तस्वीर  बा -  ख्याल   है , हाले   हिजाब   से ,
कहता कभी न आईना ,जो  देखा   कभी नहीं -

आगोश -ए- मंजिलात,हर मंजर  बदल  गए ,
मुशाफिर बदल  गए  उदय , राहें  कभी   नहीं -

                                    उदय वीर सिंह
                                        ०२/११/२०११


9 टिप्‍पणियां:

संजय भास्कर ने कहा…

आगोश -ए- मंजिलात,हर मंजर बदल गए ,
मुशाफिर बदल गए उदय , राहें कभी नहीं -
......आपने बिल्कुल सही कहा है।

संजय भास्कर ने कहा…

वाह शानदार गजल...... बहुत ही खूबसूरत अलफ़ाज़.

Sadhana Vaid ने कहा…

मंजर -ए- आफ़ताब डूबा तो क्या हुआ ,
अपनी सी लगती रात ,सितारों की कमी नहीं -


बहुत ही सुन्दर पंक्तियाँ हैं ! पूरी गज़ल ही बेमिसाल है ! बधाई !

दिलबाग विर्क ने कहा…

आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें
चर्चा मंच-687:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

दिगम्बर नासवा ने कहा…

तस्वीर बा - ख्याल है , हाले हिजाब से ,
कहता कभी न आईना ,जो देखा कभी नहीं -


इस बेहतरीन गज़ल के लिए बहुत बधाई ... गज़ब की रवानगी लिए है ये गज़ल ...

चन्दन..... ने कहा…

आगोश -ए- मंजिलात,हर मंजर बदल गए ,
मुशाफिर बदल गए उदय , राहें कभी नहीं -
क्या खूब कहा है आपने!

Rajesh Kumari ने कहा…

pahli baar aapke blog par aai hoon aana saarthak raha ek umdaa ghazal padhne ko mili.aapko follow kar rahi hoon taaki aapki rachnaaon ko padh sakun.saath hi apne blog par bhi aapko saadar aamantrit karti hoon.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत उम्दा प्रस्तुति!

Kunwar Kusumesh ने कहा…

बढ़िया है, बढ़िया है.