शनिवार, 7 सितंबर 2013

साया

उनको मालूम है हुश्न तेरी मासूमियत 
रहो नकाब में चाहे ,
परछाईयाँ साथ चलती हैं -

जमाल से परछाईयों का वास्ता न कोई 
उनकी फितरत है निभाने की 
चाहो दूर होना वो साथ होती हैं -

न पूछती हैं तेरा मजहब फिरका,
वास्ता न कोई जमातो इल्म से ,
यक़ीनन पैरोकार तेरे वजूद की तेरा ऐतबार करती हैं -
                                                     
                                         -उदय वीर सिंह 

3 टिप्‍पणियां:

तुषार राज रस्तोगी ने कहा…

आपकी यह पोस्ट आज के (०६ सितम्बर , २०१३) ब्लॉग बुलेटिन - यादें पर प्रस्तुत की जा रही है | बधाई

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

वाह, बहुत खूब..

बेनामी ने कहा…

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