रविवार, 23 अक्तूबर 2016

लौटें न हंजू कभी


मिलता जीवन कभी ,
शाखों से टूटकर -
लौटें हंजू कभी 
आँखों से छुट कर -
बसिया  दर्पण कभी 
पत्थर से टूटकर
सहरा में बादल आए
कसमें वादे तोड़कर
वो वापस न आया कदी 
गया दिल तोड़कर -

उदय वीर सिंह 

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल सोमवार (24-10-2016) के चर्चा मंच "हारती रही हर युग में सीता" (चर्चा अंक-2505) पर भी होगी!
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'