शनिवार, 3 दिसंबर 2016

राष्ट्र प्रेम की दीप शिखा पर .....

शब्द अंतस के उचर रहे 
प्रतिभागी राष्ट्र प्रेम के कहाँ गए 
शीश अर्पण की वेला आई 
यश गाने वाले  कहाँ गए -
सूनी राहें दूर- दूर तक 
मंदिर राष्ट्र का सूना है 
राष्ट्र प्रेम की दीप शिखा पर  
सौं खाने वाले कहाँ गए -
चोले- नारों में राष्ट्र प्रेम 
जाति -धर्म में सिमट गया 
रुग्ण राष्ट्र प्रतीक्षा में है 
राष्ट्र रखवारे कहाँ गए -

उदय वीर सिंह 


 




2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (04-12-2016) को "ये भी मुमकिन है वक़्त करवट बदले" (चर्चा अंक-2546) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (04-12-2016) को "ये भी मुमकिन है वक़्त करवट बदले" (चर्चा अंक-2546) पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'