शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

तुम क्या जानों आग ,कभी जले हुए नहीं हो -

दौर बीता सदियाँ बीतीं  तुम वहीं पड़े हो
तुम जग नहीं सकते,सबब सोये हुए  नहीं हो -
जली हुई देह ही, बया करती है जलन को
तुम क्या जानों आग ,कभी जले हुए नहीं हो -
जिंदा है देह, आत्मा मरी हुई निर्लज्ज
तुम जी नहीं सकते  मरे हुए नहीं हो -
शहादतों  पर बजा तालियाँ वतनपरस्त होते हो
क्या जानों कुर्बानी सिर हथेली धरे नहीं हो -
छद्म में जीना तेरी इल्मों  फितरत है वीर 
तुम फ़रजंदों के बीच पले -बढ़े हुए नहीं हो -

उदय वीर सिंह




2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा आज शनिवार (03-12-2016) के चर्चा मंच

"करने मलाल निकले" (चर्चा अंक-2545)

पर भी होगी!
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar ने कहा…

सुन्दर रचना