बुधवार, 1 अगस्त 2018

चल बैजयंती कंधे पर ....


ले चल बैजयंती कन्धों पर
अपनी हार देखता हूँ -
जीते नेता हारी जनता
मैं हर-बार देखता हूँ -
नारों में भारत एक आँगन जैसा
आज कई दिवार देखता हूँ -
वादों के झुरमुट वादों के जंगल
वादों का बाजार देखता हूँ -
खाली नींव प्रासाद सपनों का
संगमरमरी शिलान्यास पट
बार बार देखता हूँ -
हरिया आज भी हरिया है
गब्बर आज भी गब्बर हैं
जो हमसफर थे अंग्रेजों के
आज मुल्क के रहबर हैं -
पहने हार सरीखा फांसी का फंदा
अमर शहीदों का प्यार देखता हूँ -
आँखों में आँसू मानस ठगा हुआ
सपनों का व्यापार देखता हूँ -
हाथों ही नहीं कपड़ों में देखा
पुष्प मनोरम सजे हुए
उन हाथों में आज सजी दो धारी
नंगी तलवार देखता हूँ -
रस छंद अलंकार व्याकरण भाषा में
आँखों में झूठा प्यार देखता हूँ -
छोड़ गए मैदान जंग की
धर हाथ में हाथ मुस्काने वाले
जब फतह मिली सिंहासन पर
उनका अधिकार देखता हूँ -
उदय वीर सिंह


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