रविवार, 5 मई 2013

आँचल तिरंगा......

सरफरोशी जन्म लेती है , 
हमारे  गाँव  में ......
सरफ़रोश हम हो गए  ,
रह  के उसकी छाँव में-

मत दे कभी तूं खौफ को, 
मौत से  डरते नहीं
हम वतन की आशिकी में ,
मर मिटेंगे  शान में -

द्रोह  के  उन्माद में  मत ,
भूल अपने  अंत को 
शैतान की औकात  कितनी, 
 वो रहे हैं पांव में-

कट गया सिर फ़िक्र क्या ,
रण कभी छोड़ा नहीं
तन वतन का,मन वतन का,
मर मिटेंगे आन में-

मंजिल हमारी है कहाँ ,
हम बखूबी जानते .....
आँचल तिरंगा ढांप लेगा 
जब सिर गिरा मैदान  में ...... 

                           - उदय वीर सिंह    



3 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

हम जियेंगे और संग में जियेगा यह देश अपना।

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

कट गया सिर फ़िक्र क्या ,
रण कभी छोड़ा नहीं
तन वतन का,मन वतन का,
मर मिटेंगे आन में-

बहुत उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति,,,
RECENT POST: दीदार होता है,

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति!
साझा करने के लिए आभार...!
--
शुभ रात्रि ....!