रविवार, 18 मई 2014

कोई गिला नहीं -


बंद कर दे मेरे मुकद्दर को किसी  ताबूत में
कोई गिला नहीं -
कर दे सारी कायनात का दोजख मेरे नाम
कोई गिला नहीं -
छीन ले हंसी मेरे ख्वाब मेरी अदबी सल्तनत
कोई गिला नहीं -
मंसूख हो मेरी ,दौर हमनवा हो तूंती की आवाज का
मुझे कोई गिला नहीं -

                                                 - उदय  वीर सिंह 






2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (18-05-2014) को "पंक में खिला कमल" (चर्चा मंच-1615) (चर्चा मंच-1614) पर भी होगी!
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (18-05-2014) को "पंक में खिला कमल" (चर्चा मंच-1615) (चर्चा मंच-1614) पर भी होगी!
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।