रविवार, 1 जून 2014

गुरु अर्जन देव जी [शहीदी दिवस]

          हर जर्रे में तेरा नूर है कुर्बानियों का 
            तेरे वारिस हर जर्रे को सलाम करते हैं -

सिख पंथ के पांचवें गुरु अर्जन देव जी महाराज के महान शहीदी दिवस  पर अश्रुपूरित नेत्रों से भावभीनी श्रद्धांजलि | इस वलिदान दिवस पर शहीदी प्रथा के हम वारिस शुचिता संकल्प  के साथ अपने पूर्वजों के दिखाए पथ पर अडिग ,अखंड ,अहर्निश गतिमान रहेंगे, के व्रत-शपथ  को पुनः दुहराते हैं  |
          जो तो प्रेम खेलें का चाओ
          सिर धर तली गली मेरे आओ -
          जे मारग पैर धरीजै
          शीश दीजै कान्ह न कीजै -
की परंपरा से अभिभूत हम आप जी के वलिदान को सृष्टि के हर जन्मों में शुमार करते रहेंगे | जोर-जुल्म के विरुद्ध मानवता के रक्षार्थ अपना उच्चतम शौर्य, सर्वस्व न्योछावर करने की शपथ को अक्षुण रखेंगे |
       गुरु अर्जन देव जी का  जन्म श्री गोविंदवाल साहिब  में १५ अप्रैल १५६३ को माता भानी जी व गुरु रामदास जी महाराज के  घर हुआ |गुरु -गद्दी १८ वर्ष की आयु में  प्राप्त हुयी | फारसी, अरबी , संस्कृत गुरुमुखी के प्रकांड विद्वान गुरु सिखी प्रथा के पांचवें पातसाह  नवाज़े  गए | गुरु ग्रन्थ साहिब जी  के स्वर -स्वरुप को, अक्षर- स्वरुप में क्रमवद्ध कर प्रथम ग्रन्थी बाबा बुडढा  सिंह जी को नियुक्त करना , हरमंदिर साहिब की स्थापना, पवित्र सरोवर का निर्माण , तरन- तारण एवं कई अन्य शहरों का  निर्माण गुरु महाराज के  द्वारा किये गए | 
     गुरुमत प्रचार अपने सुसंगत आयामों से अपने विस्तार को परवान चढ़ाया , धर्म और  देश -प्रेम का सकारात्मक बोध ,अपनी संस्कृति का शिखर व सुखद पक्ष संयोजनात्मक रूप से प्रदर्शित व प्रतिष्ठित किया 
 परिणाम स्वरुप सिख- स्वरुप एक नए धर्म का रूप धारण करता है | 
     1606  मे अकबर की मृत्यु के बाद जहांगीर सत्ता नशीं  होता है, फिर हिन्दू व मुसलमान कट्टरपंथी फिर सिख पंथ के बिरुद्ध सक्रिय हो षडयंत्र रचते हैं, जिसमें बीरबल ,शेख सरहिंदी आदि प्रमुख रहे |  विद्रोही शहजादा खुशरो को शरण देने का इल्जाम गुरु महाराज के ऊपर  गया ,जब की वास्तविकता यह रही है की समस्त सत्तानशीं गुरु घर का  आदर व दर्शन  रहे | 
    जहांगीर को अपने व सिपहसालारों के तजवीज से लगा की पांचवें सिख गुरु उसके लिए खतरा हैं ,स्वयं रूचि ले गिरफ्तार करवा उन्हें इस्लाम  ग्रहण करने व अपनी  धार्मिक मुहीम बंद करने का फरमान जारी किया ,जो गुरु महाराज के लिए मानना नामुमकिन था परिणाम मालूम था सजाये- मौत |
    सजा  भी ऐसी की रूह  कांप  जाये , लाल गर्म  लोहे के तवे पर बैठाया गया , ऊपर से  जलती रेत शरीर पर 
डाली गयी ,फिर भी  ईर्ष्या ,अहंकार शांत  नहीं हुआ तो लोहे की सांकल में  बांध 30  मई 1606 को   दरिया रावी  में डुबोया गया | तफसील से जहाँगीर अपनी आत्म -कथा में इस घटना का बयान भी दर्ज किया है |
    इस तरह शहादत की परंपरा  जोर -जुल्म के  खिलाफ कायम रही | उनकी विरासत के हम वारिस इस महान परंपरा को सर आँखों पर उठाये गर्व करते हैं , नमन करते हैं उनके शौर्य साहस और वलिदान को -
                   तुम्हारे फलसफ़े हमारी इबादत हैं 
                         हम जिन्दा हैं तेरी कुर्बानियों से -
  
                                                                                                 -    उदय वीर सिंह 





1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (02-06-2014) को ""स्नेह के ये सारे शब्द" (चर्चा मंच 1631) पर भी होगी!
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक