रविवार, 14 सितंबर 2014

अरि गोरी का अनुचर निकला -

वर  पृथ्वीराज  का    देव  -  कवि 
अरि  गोरी  का  अनुचर  निकला -
कुछ मनसबदार अकबरी जाग्रत हैं 
जिसे समझा रत्न  पत्थर  निकला -
माना   संसारी  ,   तो  कामी क्रोधी 
सन्यासी      तो     बद्द्तर  निकला -
वसन    गाँठने     की    सूरत  थी
सुई   की   जगह   नस्तर  निकला -
राष्ट्र , प्रेम   का    सजग  अध्येता 
राष्ट्र -  द्रोह    का    घर    निकला -
श्रद्धा  संस्कृति  आस्था  का  नेता
प्रतिकूल    माण  का स्वर निकला - 
राष्ट्र -  गीत    का  परम  सनेही    
संकल्प शक्ति से कमतर निकला -


- उदय वीर सिंह 






2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (14-09-2014) को "मास सितम्बर-हिन्दी भाषा की याद" (चर्चा मंच 1736) पर भी होगी।
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चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हिन्दी दिवस की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

बढिया, बहुत सुंदर