गुरुवार, 19 मई 2016

आदमी की बात आदमी जाने

कैसे, कब , कितना टूटा, क्यों टूटा
आदमी इससे सरोकार क्यों रखिए 
यह तो आदमी की बात है आदमी जाने
फूलों की बस्तियों में वीर खार क्यों रखिए -
खरीद लेगे हमसफर हमकदम हमनवाज
मिलते हैं बाजार मे खानकाही यार क्यों रखिए -
गैरतो ईमान का फलसफा पुराना हो चला
लुटेरों की बस्तियों में पहरेदार क्यों रखिए -
उदय वीर सिंह

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (20-05-2016) को "राजशाही से लोकतंत्र तक" (चर्चा अंक-2348) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'