शुक्रवार, 20 जुलाई 2012

मंजर बदल गए ..


जलें     दीप  ,   उत्सव    मनाएं     बार ,   
अब   तो    दुआओं   में,     कसीना    है ,


थे    दुश्मन     के ,  इंतजामात    कभी
अब     खुशहाली      का     नगीना    हैं -


गुल     खिल    रहे,  जो  बोये   न   गए ,
हैरानी  है, आया  पेशानी  पे  पसीना है -


खून  -  ए- आवाम , बोतल   में  बंद  है ,
 हर शाम गुलाबी , हर जाम  नमूना है -


कुर्बान की जवानी वो जज्जबात दोनों 
मदहोशों     के    हाथ     में,  मदीना  है 


खेलते   थे    गैर ,  तमाशाई   थे    हम ,
अब  बार  अपना है ,अपनी कसीना है


कैसे   भूल   जाएँ,  ये   देश  अपना था ,
देशी     अंगरेजों    ने    देश   छिना  है -


खुद्दारों   की शहादत   जमींदोज सी है,
जाती दिखे दूर आजादी की सफीना है -


                                                    उदय  वीर सिंह 
                                                       20.07.2012





11 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

गुल खिल रहे, जो बोये न गए ,
हैरानी है, आया पेशानी पे पसीना है

गजब..

रविकर फैजाबादी ने कहा…

खुबसूरत प्रस्तुति ।

बधाई सरदार जी ।।

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

खून - ए- आवाम , बोतल में बंद है ,
हर शाम गुलाबी , हर जाम नमूना है -

बहुत खूब

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (21-07-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

Kailash Sharma ने कहा…

खुद्दारों की शहादत जमींदोज सी है,
जाती दिखे दूर आजादी की सफीना है -

....लाज़वाब अभिव्यक्ति...

dheerendra ने कहा…

हर शाम गुलाबी, हर जाम नमूना है
देशी और अंगरेजों ने,देश को है छिना,,,,,,,

RECENT POST ...: आई देश में आंधियाँ....

expression ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना ...

सादर
अनु

शिवनाथ कुमार ने कहा…

खुद्दारों की शहादत जमींदोज सी है,
जाती दिखे दूर आजादी की सफीना है -


बहुत खूब ...

Rajesh Kumari ने कहा…

खुद्दारों की शहादत जमींदोज सी है,
जाती दिखे दूर आजादी की सफीना है -

सुशील ने कहा…

बेहतरीन !

संगीता पुरी ने कहा…

खेलते थे गैर , तमाशाई थे हम ,
अब बार अपना है ,अपनी कसीना है

बहुत सुंदर ..