रविवार, 16 नवंबर 2014

प्रीत की बात कहना......


सफर के गीत ,सफर सा रचना
प्रीत के गाँव रचना, वहीं बसना -

सुरमई शाम की चंपई सुबह होगी
प्रीत की बात कहना, वही सुनना -

हृदय के साज नासाज नहीं रखना मुसाफिर के नगीने हैं प्रीत रखना-

चले घर से हो कोई अरमान लेकर
जींद सुंदर है हार न जीत रखना -

उदय वीर सिंह

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (17-11-2014) को "वक़्त की नफ़ासत" {चर्चामंच अंक-1800} पर भी होगी।
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चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'