मंगलवार, 11 नवंबर 2014

मंथर -मंथर .....


मंथर -मंथर .....

मंथर -मंथर नेह प्रिया, पग
वन सुंदरवन की ओट चला
पुण्य प्रसून  किसने  न दिए
शूल -प्रबोध  से कौन  छला-

तज्य प्रमाद आमोद भरे उर
कली किसलय सजी अचला
अभिनंदन है आमंत्रण है मधु
सृजने को  ,किसने  न  कहा -

संकुल , सौम्य , सुनेह , लली
कमनीय कन्त, की  प्रेम कला
तरु छूअन से, हतभाग्य, नसा
कटु वीथीन को सौभाग्य मिला -

उदय वीर सिंह

4 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (12-11-2014) को "नानक दुखिया सब संसारा ,सुखिया सोई जो नाम अधारा " चर्चामंच-1795 पर भी होगी।
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चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

कालीपद "प्रसाद" ने कहा…

bahut khubsurat rachna !
प्रेम !
तुझे मना लूँ प्यार से !

रश्मि शर्मा ने कहा…

Bahut sundar prastuti

Asha Joglekar ने कहा…

वाह।