रविवार, 30 नवंबर 2014

सँवारो जितना -




ये जुल्फ बिखर जाती है 
सँवारो जितना -

किश्ती जाती भंवर की ओर 
उबारो जितना -

न जागा है फरेबी सोया 
दुलारो  जितना -

न जुड़ता है टूटा सीसा 
उसारो जितना -

बुत न बोलते हैं कभी 
पुकारो  जितना -

रही साथ तो प्यार की चादर 
उधारों जितना -

उदय वीर सिंह 

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (01-12-2014) को "ना रही बुलबुल, ना उसका तराना" (चर्चा-1814) पर भी होगी।
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चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'