शनिवार, 29 नवंबर 2014

अभिशप्त-वैभव


किसी दुर्घटना 
से नहीं ,
प्रेम, अभिलाषा ,
नैशर्गिक लालित्य,
अभिमंत्रित मंत्रों के
आव्हान से 
आमंत्रित, 
अतिथि का वध !
कोई शत्रु नहीं 
स्वजनों के 
तथाकथित मर्यादित
कर-कमलों से
गौरवमयी गाथा के 
पुण्य निहितार्थ
होता है ,
कदाचित
एक देवी-प्रतिमा के रूप में
स्वीकार्य तो है ,
यथार्थ के धरातल पर 
कन्या अभिशप्त !
कदापि 
नहीं ......। 

उदय वीर सिंह 

   







2 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

एक जीवनी का पूर्ण उत्कर्ष, श्रेष्ठ हेतु आहुति

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (30-11-2014) को "भोर चहकी..." (चर्चा-1813) पर भी होगी।
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चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'