गुरुवार, 27 नवंबर 2014

हम तो प्रीत दरबारी थे -


पकड़ हाथ फिर छोड़ चले
दिल के तुम व्यापारी थे -
नफ़ा-नुकसान तुम्हारी भाषा
हम तो प्रीत दरबारी थे -
प्रीत हृदय की भाष्य-माधुरी 
तुम वंचक सरकारी थे -
पीया प्रेम निश्छल मन से
तुम तो स्वप्न आहारी थे -
प्रीत वसन सी बदली तूने
कीच- भाव व्यभिचारी थे-
टूटा मुकुर श्रिंगारसे पहले
हम पत्थर के आभारी थे -
उदय वीर सिंह
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4 टिप्‍पणियां:

राजेंद्र कुमार ने कहा…

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (28.11.2014) को "लड़ रहे यारो" (चर्चा अंक-1811)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

Neetu Singhal ने कहा…

सेवक साहुकार जहाँ चोरक चौकीदार ।
तहाँ रच्छा कौन करे, कौन करे बैपार ।२०६४ ।

भावार्थ : - जहाँ सेवक साहुकार बने फिर रहे हों । चोर चौकीदारी कर रहा हो । वहां की सुरक्षा कौन करे, कौन व्यापार करे, ऐसे में व्यवस्था को तो चौपट होना निश्चित ही है ॥

मनोज कुमार ने कहा…

हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!!

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...