बुधवार, 19 नवंबर 2014

तू कितना अनाड़ी है

देख ! तेरी वाल पर 
गंदगी का अंबार ही अंबार 
दिखाई देता है । 
दर्द,खुले जख्म, मुफ़लिसी ,यतिमी, लचारगी
आँसू ,फरियाद का कूड़ा है । 
स्वच्छता अभियान जारी है 
क्यों नहीं लगा लेते ,
बर्मीघम शायर के परिधान 
अल्जीयर के ट्यूलिप 
रूसी गुलाब ........। 
प्रतिष्ठा धूमिल हो रही है कुछ तो सोच 
जैसा है वैसा दिखना,
नहीं चाहिए.। 
दर्द में पैदा हुआ है तूँ,
दर्द के सिवा और क्या चाहिए ...?
पी ले शुद्ध गंगा जल 
भूख को छिपाने का हुनर चाहिए ....
तू कितना अनाड़ी है ,
हम चाँद पर जाने वाले हैं 
और तुझे जमीं 
चाहिए ..........।

उदय वीर सिंह  







2 टिप्‍पणियां:

Dilbag Virk ने कहा…

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 20-11-2014 को चर्चा मंच पर तमाचा है आदमियत के मुँह पर { चर्चा - 1803 } में दिया गया है
आभार

सु-मन (Suman Kapoor) ने कहा…

बहुत सुंदर