गुरुवार, 29 जनवरी 2015

छल से दूर निश्छल तो है

मेरे  कर  मिट्टी  का घट  है 
पर अमृत से संतृप्त सुघर
घट कनक तुम्हारे हाथों मेँ
विष विद्वेष से छलके भरकर -
मेरी वाणी  में मधु नहीं है 
छल  से दूर निश्छल तो है 
अंतस में घात मुस्कान अधर 
मन मैला तन सुंदर सुंदर -
तेरे पथ में बिता जीवन 
रही प्रतीक्षा अथक निरंतर 
तक गंतव्य द्विप्त दीप था 
तू छोड़ चला बनकर  रहबर -

उदय वीर सिंहमेरे कर मिट्टी का घट है
पर अमृत से संतृप्त सुघर
घट कनक तुम्हारे हाथों मेँ
विष विद्वेष से छलके भरकर -
मेरी वाणी में मधु नहीं है 
छल से दूर निश्छल तो है
अंतस में घात मुस्कान अधर
मन मैला तन सुंदर सुंदर -
तेरे पथ में बिता जीवन
रही प्रतीक्षा अथक निरंतर
तक गंतव्य द्विप्त दीप था
तू छोड़ चला बनकर रहबर -
उदय वीर सिंह

3 टिप्‍पणियां:

राजेंद्र कुमार ने कहा…

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (30.01.2015) को ""कन्या भ्रूण हत्या" (चर्चा अंक-1873)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है।

Kavita Rawat ने कहा…

बहुत सुन्दर ...

Pratibha Verma ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।