शनिवार, 10 जनवरी 2015

स्पंदन अशेष


न रोक नैन के अश्कों को
बह जाते हैं ,बह जाने दे -
वे मौन हुए निःशब्द सही
कुछ कहते हैं कह जाने दे -
पीड़ा के पाँव गतिशील हुए
चुपचाप ढले, ढल जाने दे -
कुछ आँचल,कुछ अंचला को
संवेग सलिल नम जाने दे -
कथा व्यथा का पर्ण- कुटीर
स्पंदन अशेष बन जाने दे -
हर पथ का विचलन भावी है
राही को निज राह बनाने दे -

उदय वीर सिंह

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

सार्थक प्रस्तुति।
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (11-01-2015) को "बहार की उम्मीद...." (चर्चा-1855) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

सार्थक प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (11-01-2015) को "बहार की उम्मीद...." (चर्चा-1855) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'