गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

झुकते हैं हजारों सिर

झुकते हैं हजारों सिर
स्वागतम  के लिए
मिलते बहुत ही कम
कटाने को वतन के लिए
शोहरत न.कोई तमगा 
उनको नहीं ,लुभाता
आँचल ही माँ का काफी
उनके कफन के    लिए
ठहरे हुए हैं पाँव बुत से
बहता रहा लहू सड़कों पर बेशुमार
देने वाले कम हैं 
इंसानो चमन,के लिए 

उदय वीर सिंह 

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (30-04-2017) को
"आस अभी ज़िंदा है" (चर्चा अंक-2625)
पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक