सोमवार, 3 अप्रैल 2017

क्या दौर है शराब को,

क्या दौर है शराब को
निवाला कह रहे हैं 
टकराते जहां पर जाम,
शिवाला कह रहे हैं -
हुई निलाम सरेआम 
मोहब्बत की कली 
बेचा जिसे बाजार में,
घरवाला कह रहे हैं -
जब्त करले मसर्रत ही नहीं
अहसासों को भी 
हो अख़्तियार खुद पर
ताला कह रहे हैं -

उदय वीर सिंह



2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (04-04-2017) को

"जिन्दगी का गणित" (चर्चा अंक-2614)
पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
विक्रमी सम्वत् 2074 की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

वाह।