शुक्रवार, 7 अगस्त 2015

दिवास्वप्न का मानस

क्षीणता प्रवीणता को दागदार कहती है
अक्षमता प्रशंसा को बीमार कहती है -
टूटा आत्मबल, पसरा आँखों में सूनापन
कुदृष्टि मृगमरीचिका को जलधार कहती है -

विपन्नता, संपन्नता को अधिकारहर्ता
अनुशासनहीनता सुकर्म को कदाचार कहती है
स्वेक्षाचारिता आचार को हीन ,अशक्त
पतिता  वासना को अधिकार कहती है -

स्थूलता गतिमान को निराश्रय पथविहीन
हठवादिता परिमार्जन को धिक्कार कहती है
पराजय विजय को षडयंत्रकारी, निर्मम
विपथगा कृतघ्नता को संस्कार कहती है -

दिवास्वप्न का मानस गंतव्य को दीन
परजीविता प्रयत्न को अपमान कहती है
दासत्व के अनुबंध में पाई पद प्रतिष्ठा
पादुका की चोट को सम्मान कहती है -

- उदय वीर सिंह 




3 टिप्‍पणियां:

Tushar Rastogi ने कहा…

आपकी इस पोस्ट को शनिवार, ०८ अगस्त, २०१५ की बुलेटिन - "पश्चाताप के आंसू" में स्थान दिया गया है। कृपया बुलेटिन पर पधार कर अपनी टिप्पणी प्रदान करें। सादर....आभार और धन्यवाद। जय हो - मंगलमय हो - हर हर महादेव।

Upasna Siag ने कहा…

बहुत बढ़िया ....

anamika ghatak ने कहा…

shabd chayan lajawab