रविवार, 23 अगस्त 2015

समस्त दंश जारे हैं -

जाने न जाने वीथियाँ ,कब तक हमारे साथ 
आँधियों की सांझ न जाने दीप कैसे उजारे हैं 
कब तक चलेंगे पाँव विश्राम भी अनुमन्य है 
पथरीले पथों में उर्मियां ,ज्योत्सना न तारे हैं -

श्रिंखला ,विषाद  की  प्रतीक्षावनत नहीं रही 
हर्ष की अनुभूतियों में दिवस दुख के विसारे हैं 
हतभाग्य का प्रलेख संकलित मिला तो क्या 
हृदय पटल संचित पीड़ा के भग्नावशेष सारे हैं -

पूछता अंशुमान तज संवेदना की छांव शीतल 
पथ प्रशस्त कर सकोगे तेरे दृष्टि, गात हारे हैं 
कर दी निराश्रित वेदना संकल्प का अभिषेक कर 
आत्मबल के अग्नि कुंड में समस्त दंश जारे हैं -

उदय वीर सिंह 


2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (25-08-2015) को "देखता हूँ ज़िंदगी को" (चर्चा अंक-2078) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

सु-मन (Suman Kapoor) ने कहा…

बहुत बढ़िया