शनिवार, 26 दिसंबर 2015

अमर वलिदानी बाबा जोरावर सिंह जी बाबा फतेह सिंह जी

अमर वलिदानी
बाबा जोरावर सिंह [28 Nov  1695 आंदपुर साहिब  -26 Dec 1705 सरहिंद ]
बाबा फतेह सिंह [ 22Dec 1699 आंदपुर साहिब - 26 Dec 1705 सरहिंद ]
 शहादत दिवस पर अश्रुपूरित नयनों से इन अद्द्भुत अकल्पनीय अमर वालिदानियों को अपनी विनम्र श्रद्धांजलि देते हैं ।
                "  हैरानगी है मौत को कि हमें मौत क्यों नहीं आती "
माँ का नाम -  गुरुमता सुंदरी जी 
पिता -            गुरु गोबिन्द सिंह 
नाम -           बाबा जोरावर सिंह  
जन्म स्थान - आनंदपुर साहिब  28 nov 1695
वलिदान दिवस - 26 Dec 1705  सरहिंद 
नाम     -      बाबा फतेह सिंह 
जन्म स्थान - आनंद पुर साहिब  22 Dec  1699
वालिदान दिवस - 26 Dec 1705  सरहिंद 
गुनाह - देशभक्ति , कौम का वफादार सिपाही होना,अपने संस्कारों पर अडिग रहना , इस्लाम स्वीकार नहीं        करना । मांता पिता के संस्कारों [सिक्खी] की अंतिम स्वांस तक रक्षा करना ।
सजा -  मौत जिंदा  दीवार में चुनवा कर  ।
संकल्प -धर्म की जीत
संदेश - वाहेगुरु जी दा खालसा वाहे गुरु जी दी फतेह
आदर्श - गुरु गोबिन्द सिंह जी
पहचान -पंच ककार
सूत्र वाक्य - देहि शिवा वर मोहे है शुभ कर्मन ते कबहुँ न डरो  ....
कर्म - ज़ोर जुल्म का विरोध
विश्व के सबसे कम उम्र के वलिदानी जिनका अदालत में मुकदमा चला ,जिसमें  अपनी वकालत वे स्वयं कर रहे थे । दादी माँ  [ गूजर कौर ] के  पावन सानिध्य में रह अपने संस्कारों दायित्वों और खाई कसमों  को सहर्ष जीवन देकर निभाया । जो नहीं मिलता कहीं और दुनियाँ के इतिहास में । जब गुरु परिवार खेरू खेरू हो गया , माँ से, पिता से ,घर से भाइयों से  आतातयियों के चौतरफा हमले के कारण पारिवारिक सदस्यों का बिछोड़ा हो गया । दो  बड़े भाई अजित सिंह ,जुझार सिंह चमकौर की जंग में शहीद हो गए । एक पिता शांत अविचलित हो धर्म की अग्नि कुंड में अपने लालों की आहुती दे रहा था । स्तब्ध थे दौर ,जुल्म  ही नहीं सितमगर भी ।
   मात्र छह साल और नौ साल से कम के इन अद्द्भुत अप्रतिम वलिदानियों की  पावन शहीदी स्थली पर गुरुद्वारा  फतेहगढ़ साहिब आज साक्ष्य स्वरूप हैं ।
       न झुका सके  जालिम औरंगजेब का फरमान, न ही सरहिंद का सूबेदार  नवाब वजीर खान की अदालत , न गद्दार गंगू पंडित की शिनाख्त ,न ही सुच्चा नन्द  की मौत की सिफारिस, न ही काजी का फतवा ,न ही सुख  एश्वर्य, जीवन का लोभ  ही ।
   गर्व है हम उनके वारिस हैं ।
     
उदय वीर सिंह



2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (27-12-2015) को "पल में तोला पल में माशा" (चर्चा अंक-2203) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Smart Indian ने कहा…

नमन उन वीरों को जिनके त्याग और बलिदान के कारण भारत के आदर्श वाक्य सत्यमेव जयते पर विश्वास बना हुआ है।