सोमवार, 28 मार्च 2016

सूरज तो सबकी छत पर है

चाहो तुम  घर अंधेरा रखो
सूरज तो सबकी छत पर है-
तुम चाहो तो नीर विहीन रहो
कब सून्य धरा जल निर्झर है -
तुम चाहो तो स्वांस न लो
जल -थल में वायु निरंतर है -
गंतव्य तुम्हें ही लिखना होगा
जीवन का पृष्ठ तो  सुंदर है -
तुम चाहो तो गीत लिखो
भाषा ,काव्य बृहदत्तर  है -



1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (29-03-2016) को "सूरज तो सबकी छत पर है" (चर्चा अंक - 2296) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'