रविवार, 5 अप्रैल 2020

हथ जोड़ विनय हम करते हैं

प्रलाप पाखण्ड का यह समय नहीं
अनुशासन विज्ञान के साथ चलो
रण में हास- परिहास नहीं होता
विधि मूलक ज्ञान के साथ चलो -
सत्ता और सिंहासन का कर्त्तव्य असीम हो जाता है
दुर्गम-पथ अवरुद्ध मार्ग में संयम नवीन हो जाता है-
निचे अनल सरित की धारा है ,
क्षतिग्रस्त सेतु ,निर्मान करो --
अग्रे अगम चुनौती है ,मानव -मात्र के रक्षण की
देंगे चूक विलम्ब परिणाम विषम जन जीवन की-
अर्जित स्नेह का पावन काल
मुक्त-हस्त प्रतिदान करो -
औषधि निर्धारण में वैद्य औषधि-श्रेष्ठ को चुनता है
स्व की चिंता त्याग वीर पीड़ा जन-मानस की हरता है -
निर्णय कठोर अनुमन्य निति
जनहित सम-पथ उनवान करो-
हाथ जोड़ विनय हम करते हैं ,
जन आवेदन का सम्मान करो
उदय वीर सिंह


4 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

बहुत सुन्दर।
हम सभी देशवासी मिल कर प्रधानमन्त्री की आवाज पर
अपने घर के द्वार पर 9 मिनट तक एक दीप प्रज्वलित जरूर करें।

'एकलव्य' ने कहा…

आदरणीया/आदरणीय आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर( 'लोकतंत्र संवाद' मंच साहित्यिक पुस्तक-पुरस्कार योजना भाग-२ हेतु नामित की गयी है। )

'बुधवार' ०८ अप्रैल २०२० को साप्ताहिक 'बुधवारीय' अंक में लिंक की गई है। आमंत्रण में आपको 'लोकतंत्र' संवाद मंच की ओर से शुभकामनाएं और टिप्पणी दोनों समाहित हैं। अतः आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य"

https://loktantrasanvad.blogspot.com/2020/04/blog-post_8.html

https://loktantrasanvad.blogspot.in/



टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'बुधवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।


आवश्यक सूचना : रचनाएं लिंक करने का उद्देश्य रचनाकार की मौलिकता का हनन करना कदापि नहीं हैं बल्कि उसके ब्लॉग तक साहित्य प्रेमियों को निर्बाध पहुँचाना है ताकि उक्त लेखक और उसकी रचनाधर्मिता से पाठक स्वयं परिचित हो सके, यही हमारा प्रयास है। यह कोई व्यवसायिक कार्य नहीं है बल्कि साहित्य के प्रति हमारा समर्पण है। सादर 'एकलव्य'

Sudha devrani ने कहा…

सत्ता और सिंहासन का कर्त्तव्य असीम हो जाता है
दुर्गम-पथ अवरुद्ध मार्ग में संयम नवीन हो जाता है-
वाह!!!
बहुत सुन्दर।

Rohitas ghorela ने कहा…

उम्दा रचना है जनाब.
इस समय में वैध किसी सीमा पर लड़ते जवान से कम नहीं है. सरकार उनके बचाव की सारी सामग्री उपलब्ध कराए ये सरकारों का नैतिक कर्तव्य है. जनता इसमें संयम बनाएं रखे. बहुत खुबसुरत व सटीक रचना.
पहली बार आपको पढ़ा- आपकी लेखनी का कायल हो गया.
मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत रहेगा- आइयेगा- नई रचना- एक भी दुकां नहीं थोड़े से कर्जे के लिए