शुक्रवार, 11 अक्तूबर 2013

गुलाब कहते रहे -

रेशम में लिपटे काँटों को
हम गुलाब कहते रहे -
नीव खोदी ही नहीं गयी मितरां
मकान बनते रहे-
जो बन न सका जुगुनू भी,रात का
उसे माहताब कहते रहे -
जो कर गया टुकड़ों में वतन
सिरताज कहते रहे -
शुमार कर दिया आतंकवादियों में जिनको
वो इनकलाब कहते रहे -
झूल गए फांसी पर मर्द हंसते -हंसते
ना-मर्द वाह- वाह कहते रहे -
सारा जीवन हिंसा में ही गुजर गया
वो अहिंसा का पाठ करते रहे-
सोचा नहीं अवाम की दर्दो आवाज क्या है
 सौदाई  कारोबार करते रहे-

                         -  उदय वीर सिंह  

11 टिप्‍पणियां:

Darshan jangra ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा - शुक्रवार - 11/10/2013 को माँ तुम हमेशा याद आती हो .... - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः33 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया पधारें, सादर .... Darshan jangra


चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

बहुत ख़ूब!

Anupama Tripathi ने कहा…

आज का यथार्थ ...गहन रचना ...

Anupama Tripathi ने कहा…

आज का यथार्थ ...गहन रचना ...

ई. प्रदीप कुमार साहनी ने कहा…

बहुत सुंदर प्रस्तुति |

मेरी नई रचना :- मेरी चाहत

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

आपकी रचना में कड़वा सच सामने आ गया है।

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

अजी क्या बात है क्या अंदाज़ है आपका। क्या ज़ज्बा और मर्तबा है आपका और रचना के तेवर का।

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

रोचक विस्तार विज्ञान का वैदिक आलोक में।

राजीव कुमार झा ने कहा…

बहुत सुन्दर .
नई पोस्ट : मंदारं शिखरं दृष्ट्वा
नई पोस्ट : प्रिय प्रवासी बिसरा गया
नवरात्रि की शुभकामनाएँ .

कालीपद प्रसाद ने कहा…

बहुत बढ़िया
लेटेस्ट पोस्ट नव दुर्गा

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति ....!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (12-10-2013) को "उठो नव निर्माण करो" (चर्चा मंचःअंक-1396) पर भी होगी!
शारदेय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'