गुरुवार, 31 अक्तूबर 2013

जो दीपों के स्वर होते....

जो    दीपों     के    स्वर   होते
तो अपनी  पीड़ा वे  कह   लेते  -

जितनी    लौ    उतनी   शोभा
जितनी ज्वाला  उतना प्रकाश-
दग्ध   ह्रदय    सहता   जलता
मानव    मन    पाता    उजास-

जग  की  रीत जला कर देखो
जलता    देख    हर्षित    होते -

मंदिर  वो  मस्जिद   में  जला
घर  आँगन , उपवन  में  जला
मद-  बसंत  पतझड़  में  जला
ग्रीष्म, शरद  सावन  में  जला-

कुछ  दर्द  पवन  ने लेना चाहा
एक  भीत  कवच  सी  रच देते  -

शिक्षालय  मदिरालय  में जला
देवालय   वेश्यालय   में   जला-
सवर्ण  कुटीर  महलों  में  जला
झुग्गी  में  अनाथालय में जला-

चुप  चाप जले  हर शाम जले
संवेदनहीन   जन    क्या  देते  -

मन    मयूर    जब   नृत्य   करे
जलती   ढिंग   दीपों   की  माला
जलता  हृदय  अभिनन्दन  थाल
जब   जले   दीप  सजती   शाला-

कौन  अंतस   की   आह  सुने
जो दो  बोल   प्रेम  के  गढ़   देते -


                       -  उदय वीर सिंह 

















2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (01-11-2013) ना तुम, ना हम-(चर्चा मंचः अंक -1416) "मयंक का कोना" पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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धनतेरस (धन्वन्तरी महाराज की जयन्ती) की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

मन की कहना, सहज हो चले..