गुरुवार, 3 अप्रैल 2014

मंजिलों की बात है...

तीरगी से खौफ क्या
सहर हुई तो क्या हुआ-
मंजिलों की बात है
न मिली तो क्या हुआ -

दर मंसूख कभी मंजूर
रियाया वक्त के हम हैं


चल रहे थे साथ ले दम
ठहर गए तो क्या हुआ -

हमने तूफान की गर्दिशी
भंवर की रफ्तगी देखी
अभी भी साथ किश्ती है
साहिल नहीं तो क्या हुआ -

गीत शायर की चाहत है
शायर गीत का आलिम
पढता  हर  गली कूंचा
महफ़िल नहीं तो क्या हुआ -


                        उदय वीर सिंह .

3 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत खूब !

राजेंद्र कुमार ने कहा…

आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (04.04.2014) को "मिथकों में प्रकृति और पृथ्वी" (चर्चा अंक-1572)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, वहाँ पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

वाह, बहुत खूब।