सोमवार, 7 अप्रैल 2014

महावर रचोगे -




कोई  अंजुमन   में  शरारत  रचोगे
फरेबों  की   कोई  इबारत  लिखोगे   -

वादों  में   अपनी   शहादत  लिखोगे
रकीबों को अपनी हिफाजत लिखोगे -

पांवों  में   अपने   न   होगी  विबाई
रख  ऊपर  जमीं  से  महावर रचोगे -

रश्में -मोहब्बत से तुमको क्या लेना 
यहाँ  आज  हो ,कल कहीं जा बसोगे- 

सदा  न   रहेगा  ये  मंजर  हंसी का 
रो -रो कर एक दिन  इबादत  करोगे -


2 टिप्‍पणियां:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत सुंदर !

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

हर दिन अपना एक जीवन सा।