शनिवार, 11 अक्तूबर 2014

तुम दवा होके देखो -


मैं खुश हूँ इंसानियत की पनाह 
तुम खुदा होके देखो -

दर्द क्या होता है दिल लगाने का 
तुम जुदा होके देखो -

फितरत है महबूब की लूटने की 
तुम फिदा होके देखो -

ताबिंदा सितारे छुप नहीं सकते 
तुम गुमशुदा होके देखो -

बदलते हालात मुक्तसर, होते फासले 
गम में गमजदा होके देखो -

किसी मजलूम की चाहत क्या है 
उसकी इल्तजा होके देखो -

नासूर का दर्द कितना होता है ,
तुम दवा होके देखो - 

उदय वीर सिंह 

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (13-10-2014) को "स्वप्निल गणित" (चर्चा मंच:1765) (चर्चा मंच:1758) पर भी होगी।
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चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'