शुक्रवार, 3 अक्तूबर 2014

शाख के पत्ते हो आखिर ...



उदय लिखना तो जमाने की अर्ज लिखना
रिसते हुये तमाम जख्मों का दर्द लिखना -
लाशों से गुजर गए महफिले मंजिल देखते
एक इंसान को इंसानियत का फर्ज लिखना-
तूफान भी देता है आबाद होने का हौसला
पाँव में पड़े छालों को अपना हमदर्द लिखना-
जी सकोगे ,हकीकत की जमीन पर बेखौफ
बसंत को बसंत पतझड़ को पतझड़ लिखना-
शाख  पर पत्ते हो आखिर गिरना है टूट कर
जमीन पर आना तो रंग उनका जर्द लिखना -

उदय वीर सिंह

1 टिप्पणी:

anand murthy ने कहा…

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